ख़ोजी एनसीआर/ सोनू वर्मा फरीदाबाद। अनंगपुर में जगतगुरु सुदर्शनाचार्य जी का जन्म उत्सव मनाया गया ।स्वामी मधुसूदन आचार्य ने पत्रकारों से चर्चा करते हुये बताया की कोरोना महामारी को देखते हुय
व सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन्स पालन किया गया। स्वामी मधुसूदन आचार्य जी ने अपने भगतो को बताया कि जगद्गुरु सुदर्शनाचार्य का जन्म: 27 मई 1937 श्री रामानुजाचार्य द्वारा स्थापित वैष्णव सम्प्रदाय के एक प्रख्यात हिन्दू सन्त थे जिन्हें तपोबल से असंख्य सिद्धियाँ प्राप्त थीं। राजस्थान प्रान्त में सवाई माधोपुर जिले के पाड़ला ग्राम में एक ब्राह्मण जाति के कृषक परिवार में शिवदयाल शर्मा के नाम से जन्मे इस बालक को मात्र साढ़े तीन वर्ष की आयु में ही धर्म के साथ कर्तव्य का वोध हो गया था। बचपन से ही धार्मिक रुचि जागृत होने के कारण उन्होंने सात वर्ष की आयु में ही मानव सेवा का सर्वोत्कृष्ट धर्म अपना लिया था। वेद, पुराण व दर्शनशास्त्र का गम्भीर अध्ययन करने के उपरान्त उन्होंने बारह वर्ष तक लगातार तपस्या की और भूत, भविष्य व वर्तमान को ध्यान योग के माध्यम से जानने की अतीन्द्रिय शक्ति प्राप्त की। उन्होंने फरीदाबाद के निकट बड़खल सूरजकुण्ड रोड पर 1990 में सिद्धदाता आश्रम की स्थापना की जो आजकल एक विख्यात सिद्धपीठ का रूप धारण कर चुका है।1998 में हरिद्वार के महाकुम्भ में सभी सन्त महात्मा एकत्र हुए और सभी ने एकमत होकर उन्हें जगद्गुरु की उपाधि प्रदान की। आश्रम में उनके द्वारा स्थापित धूना आज भी उनकी तपश्चर्या के प्रभाव से अनवरत उसी प्रकार सुलगता रहता है जैसा उनके जीवित रहते सुलगता था। सुदर्शनाचार्य तो अब ब्रह्मलीन (दिवंगत) हो गये परन्तु भक्तों के दर्शनार्थ उनकी चरणपादुकायें (खड़ाऊँ) उनकी समाधि के समीप स्थापित कर दी गयी हैं। सिद्धदाता आश्रम में आज भी उनके भक्तों का मेला लगा रहता है। यहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय का हो, बिना किसी भेदभाव के प्रवेश की अनुमति है। वर्तमान में स्वामी मधुसूदन आचार्य यहाँ आने वाले श्रद्धालु भक्तों की समस्या सुनते हैं और सिद्धपीठ की आज्ञानुसार उसका समाधान सुझाते हैं। सुदर्शनाचार्य जी का प्रादुर्भाव 27 मई 1937 को राजस्थान की पावन अवनी में सवाई माधोपुर मण्डलान्तर्गत पाड़ला ग्राम के एक सम्पन्न कृषक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम शिवदयाल शर्मा था। गोस्वामी तुलसीदास के वचनों को हृदयंगम करते हुए उन्होंने भानगढ़ के बीहड़ जंगलों में बारह वर्षो तक कठोर तपस्या की। तपस्या के दौरान उन्हें तन्त्र-मन्त्रों की प्रत्यक्ष अनुभूति हुई। इस प्रकार लोकोपकार की उदात्त भावना लेकर वे सांसारिक जीवों के बीच जा पहुँचे।सुदर्शनाचार्यजी महाराज के विलक्षण वैभव व गुणों से प्रभावित होकर वैष्णव समुदाय ने 1998 के हरिद्वार महाकुम्भ में पतित पावनी गंगा किनारे समस्त जगद्गुरुओं, पीठाधीश्वरों, त्रिदण्डी स्वामियों, आचार्यो तथा समस्त वैष्णव समुदाय के समक्ष उन्हें जगद्गुरु रामानुजाचार्य के पद पर विभूषित कर, इस पद की गरिमा का पदोचित सम्मान किया। इसके एक माह के भीतर ही 22 मई 2007 के मध्यान्ह काल अभिजित नक्षत्र के शुभ समय में सूर्यांश को ग्रहण करते हुए उन्होंने अपने इस नश्वर शरीर को त्याग दिया और गोलोकवास में चले गये। इस मौके पर विजय पाल,कैलाश,शेखर एसबी मिश्रा व अन्य भगतजन मौजूद रहे।
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